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    काशी के लकड़ी के खिलौनों को दुनिया भर में पहचान दिला रहीं शुभी अग्रवाल, 457 महिलाओं को बनाया आत्मनिर्भर


    • मोहम्मद रिजवान
    वाराणसी :- काशी की गलियों में जन्मी एक पारंपरिक कला आज दुनिया के कई देशों में अपनी अलग पहचान बना चुकी है। कभी केवल स्थानीय बाजारों तक सीमित रहने वाले बनारस के लकड़ी के खिलौने अब जापान, फ्रांस, स्पेन, ब्राजील, आस्ट्रेलिया और इंग्लैंड तक पहुंच रहे हैं।

    इस बदलाव के पीछे नई पीढ़ी की शिल्प उद्यमी शुभी अग्रवाल की दूरदर्शिता, नवाचार और निरंतर प्रयास की महत्वपूर्ण भूमिका है। लोलार्क कुंड निवासी शुभी न केवल अपने पारिवारिक शिल्प को आगे बढ़ा रही हैं, बल्कि सैकड़ों महिलाओं और शिल्पकारों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन चुकी हैं।

    शुभी अग्रवाल ने वर्ष 2017-18 के बाद बाजार की बदलती मांग को गहराई से समझा। उन्होंने रामायण और महाभारत की कथाओं को खिलौनों के माध्यम से प्रस्तुत करने का निर्णय लिया। आसमान में उड़ते हनुमान की थीम पर बनाए गए खिलौनों को विशेष लोकप्रियता मिली। उनका मानना है कि विदेशी पर्यटक भगवान शिव और हनुमान के बारे में तो जानते थे, लेकिन भारतीय संस्कृति के अन्य आयामों से उन्हें जोड़ने की जरूरत थी।
    अब फिशर टायज जैसे नए-नए उत्पादों के जरिए जापान और फ्रांस के ग्राहकों को जोड़ने की कोशिश की जा रही है। लकड़ी के खिलौनों का यह सफर वर्ष 1958 में शुरू हुआ था, जब शुभी के दादाजी शशि नारायण अग्रवाल ने इस काम की नींव रखी। इसके बाद वर्ष 1985 में उनके पिता बिहारी लाल अग्रवाल ने इसे आगे बढ़ाया। उस समय झुनझुना, सिंदोरा, चटनीदान, फिरंगी और अन्य पारंपरिक लकड़ी के उत्पाद बनाए जाते थे। बाजार मुख्य रूप से स्थानीय था और ग्राहकों में मद्रासी तथा बंगाली पर्यटक अधिक दिखाई देते थे।

    वर्ष 1985 के आसपास काशी विश्वनाथ मंदिर आने वाले विदेशी पर्यटकों की रुचि को देखते हुए परिवार ने नए प्रयोग शुरू किए। विदेशी पर्यटक सिंदोरा जैसे पारंपरिक उत्पाद नहीं खरीदते थे। ऐसे में हाथी-घोड़े जैसे सजावटी खिलौनों का निर्माण शुरू हुआ। उल्लेखनीय बात यह कि आज भी इस शिल्प का लगभग 80 प्रतिशत काम हाथों से किया जाता है। काशी के लकड़ी के खिलौनों को जीआइ टैग भी प्राप्त है, जिसने इस कला को नई प्रतिष्ठा दी है।

    शुभी वर्तमान में 32 शिल्पकारों के साथ काम कर रही हैं। उन्होंने अब तक 457 महिलाओं को प्रशिक्षित कर आत्मनिर्भर बनने का अवसर दिया है। शिल्पकारों को उनके कार्य के अनुसार 200 से 500 रुपये तक पारिश्रमिक दिया जाता है। वर्ष 2024 में केंद्र सरकार की ओर से उन्हें विश्व आर्थिक मंच के कार्यक्रम में स्विट्जरलैंड जाने का अवसर मिला, जो उनके कार्य की बड़ी उपलब्धि है।

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