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    दालमंडी सड़क चौड़ीकरण के बीच भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खां के पैतृक मकान पर संकट, पद्मश्री सोमा घोष ने संरक्षण की उठाई मांग


    • मोहम्मद रिजवान
    वाराणसी :- काशी की सांस्कृतिक पहचान और भारतीय शास्त्रीय संगीत की अमूल्य धरोहर भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खां की यादों से जुड़ा उनका पैतृक मकान इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है। दालमंडी सड़क चौड़ीकरण परियोजना के तहत हड़हासराय स्थित उनके मकान पर ध्वस्तीकरण की आशंका जताई जा रही है, जिससे संगीत प्रेमियों और स्थानीय लोगों में चिंता बढ़ गई है।

    उस्ताद बिस्मिल्लाह खां केवल एक महान शहनाई वादक ही नहीं थे, बल्कि वे काशी की आत्मा और गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल भी थे। उनकी शहनाई की गूंज ने काशी के घाटों से लेकर देश-दुनिया तक भारतीय संगीत को नई पहचान दिलाई। स्वतंत्र भारत के इतिहास में भी उनका विशेष स्थान रहा, जब उन्होंने लाल किले से शहनाई बजाकर देश के नए सफर का स्वागत किया था।

    बताया जाता है कि एक समय उन्हें मुंबई जाकर बसने का प्रस्ताव भी मिला था, लेकिन उन्होंने काशी और मां गंगा से अपने गहरे जुड़ाव के कारण इसे स्वीकार नहीं किया। उनका प्रसिद्ध कथन, “मुंबई में गंगा कहां से लाओगे?” आज भी लोगों की जुबान पर है।

    इसी बीच उनकी दत्तक पुत्री और प्रसिद्ध शास्त्रीय एवं उपशास्त्रीय गायिका पद्मश्री सोमा घोष ने इस मुद्दे पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने प्रदेश सरकार और प्रशासन से अपील करते हुए कहा कि सड़क चौड़ीकरण विकास के लिए आवश्यक हो सकता है, लेकिन उस्ताद बिस्मिल्लाह खां से जुड़ी इस ऐतिहासिक धरोहर को संरक्षित किया जाना चाहिए।

    सोमा घोष ने कहा कि यदि संभव हो तो वैकल्पिक व्यवस्था खोजी जाए और इस मकान को स्मृति स्थल या सांस्कृतिक स्मारक के रूप में विकसित किया जाए। उनके अनुसार यह मकान सिर्फ एक इमारत नहीं, बल्कि भारतीय संगीत इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है।

    उन्होंने बताया कि उस्ताद बिस्मिल्लाह खां का बचपन इसी घर में बीता था। यहीं उन्होंने अपनी शहनाई का रियाज किया और इसी स्थान से उनकी संगीत यात्रा ने नई ऊंचाइयों को छुआ। इस घर की दीवारें, कमरे और हर कोना उनके संघर्ष, साधना और संगीत की कहानी कहते हैं।

    सोमा घोष का कहना है कि यदि इस मकान को तोड़ दिया गया तो यह केवल एक भवन का नुकसान नहीं होगा, बल्कि भारतीय संगीत की एक अमूल्य विरासत भी प्रभावित होगी। उन्होंने सरकार से इस भवन को सांस्कृतिक धरोहर का दर्जा देने और इसे संरक्षित करने की मांग की है।

    उन्होंने संगीत प्रेमियों और आम नागरिकों से भी इस विषय पर अपनी आवाज उठाने की अपील करते हुए कहा कि यह सिर्फ काशी का मुद्दा नहीं, बल्कि पूरे देश की सांस्कृतिक विरासत से जुड़ा विषय है। उस्ताद बिस्मिल्लाह खां का यह घर आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का केंद्र बन सकता है, इसलिए इसके संरक्षण की दिशा में गंभीर प्रयास किए जाने चाहिए

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