• Breaking News

    इंद्रदेव को मनाने की अनूठी परंपरा, गंगा तट पर कलाकारों ने छेड़ा राग 'मेघ'

    • मोहम्मद रिजवान
    वाराणसी :- ज्येष्ठ और आषाढ़ की तपती गर्मी से परेशान काशीवासियों को राहत दिलाने की कामना के साथ मंगलवार सुबह गंगा तट पर एक अनोखा सांगीतिक अनुष्ठान आयोजित किया गया। धर्म और संस्कृति की नगरी काशी में बारिश के देवता इंद्र को प्रसन्न करने के लिए शास्त्रीय संगीत के माध्यम से वर्षा का आह्वान किया गया।
    ऐतिहासिक रीवा घाट पर आयोजित इस विशेष कार्यक्रम में काशी विश्वनाथ मंदिर के शहनाई वादक पंडित महेंद्र प्रसन्ना और उनके सहयोगी कलाकारों ने भाग लिया। कार्यक्रम की शुरुआत मां गंगा के विधिवत पूजन और वंदन से हुई। कलाकारों ने गंगा को पियरी अर्पित कर लोकमंगल और समय पर अच्छी वर्षा की कामना की।

    इसके बाद शहनाई पर राग मेघ का वादन किया गया। भारतीय शास्त्रीय संगीत में राग मेघ को वर्षा और बादलों से जुड़ा माना जाता है। घाट पर गूंजते शहनाई के मधुर स्वरों ने उपस्थित श्रद्धालुओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। कलाकारों का मानना है कि संगीत और श्रद्धा के समन्वय से प्रकृति में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
    राग मेघ की प्रस्तुति के बाद भजन और पारंपरिक रचनाओं का गायन-वादन किया गया। "इंद्र बरसो रे काशी नगरिया" जैसे लोकभावनाओं से जुड़े गीतों के साथ कार्यक्रम की पूर्णाहुति हुई। इस दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु और संगीत प्रेमी मौजूद रहे।

    काशी की सांस्कृतिक परंपरा में संगीत को साधना और लोककल्याण का माध्यम माना जाता है। प्राकृतिक चुनौतियों के समय यहां के कलाकार अपनी कला के जरिए समाज और प्रकृति के बीच सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास करते हैं। रीवा घाट पर आयोजित यह अनूठा आयोजन भी इसी परंपरा की एक सुंदर मिसाल बनकर सामने आया।

    No comments

    Post Top Ad

    Post Bottom Ad