अल-नीनो की आहट से बढ़ी चिंता: क्या कमजोर पड़ेगा मानसून, दोबारा लौट सकते हैं सूखे जैसे हालात?
नई दिल्ली :- प्रशांत महासागर में अल-नीनो (El Niño) की संभावित सक्रियता को लेकर वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ गई है। मौसम विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह प्रणाली मजबूत होती है तो भारत सहित दक्षिण एशिया में मानसून पर इसका असर दिखाई दे सकता है। हालांकि विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट कर रहे हैं कि 1876-78 जैसे भीषण अकाल की परिस्थितियों की सीधी तुलना वर्तमान समय से करना उचित नहीं होगा, क्योंकि आज मौसम पूर्वानुमान, सिंचाई व्यवस्था, खाद्यान्न भंडारण और आपदा प्रबंधन पहले की तुलना में कहीं अधिक मजबूत हैं।
अल-नीनो एक प्राकृतिक जलवायु प्रक्रिया है, जिसमें मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर का सतही तापमान सामान्य से अधिक हो जाता है। इसका असर दुनिया के कई हिस्सों के मौसम पर पड़ता है। भारत में इसके दौरान अक्सर दक्षिण-पश्चिम मानसून कमजोर रहने की आशंका रहती है, जिससे वर्षा कम हो सकती है और कृषि प्रभावित हो सकती है। हालांकि हर अल-नीनो वर्ष में सूखा पड़े, यह जरूरी नहीं है। कई बार हिंद महासागर डाइपोल (IOD) जैसी अन्य जलवायु प्रणालियां इसके प्रभाव को कम भी कर देती हैं।
इतिहास बताता है कि वर्ष 1876-78 के दौरान बेहद शक्तिशाली अल-नीनो के साथ कमजोर मानसून और औपनिवेशिक शासन की नीतियों ने भीषण अकाल की स्थिति पैदा कर दी थी। लाखों लोगों की जान गई थी। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि उस समय और आज की परिस्थितियों में बड़ा अंतर है। वर्तमान में भारत के पास बेहतर सिंचाई नेटवर्क, खाद्यान्न भंडार, आधुनिक मौसम विज्ञान और राहत तंत्र उपलब्ध है, जिससे बड़े संकट की आशंका काफी हद तक कम हो जाती है।
फिर भी यदि अल-नीनो प्रभावी होता है तो इसका असर खेती, जलाशयों के जलस्तर, बिजली उत्पादन और खाद्य महंगाई पर पड़ सकता है। विशेष रूप से वर्षा आधारित खेती वाले क्षेत्रों में किसानों की चिंता बढ़ सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले हफ्तों में मानसून की प्रगति और समुद्री परिस्थितियों पर लगातार नजर रखना जरूरी होगा।
मौसम वैज्ञानिकों का निष्कर्ष है कि अल-नीनो को लेकर सतर्क रहने की आवश्यकता है, लेकिन घबराने की नहीं। आधुनिक तकनीक, वैज्ञानिक पूर्वानुमान और बेहतर सरकारी तैयारियां किसी भी संभावित चुनौती से निपटने में पहले की तुलना में अधिक सक्षम हैं।

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