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    प्रयागराज में सातवीं मोहर्रम पर निकला 191 साल पुराना गश्ती दुलदुल जुलूस, घर-घर पहुंचकर हुआ इस्तकबाल

    प्रयागराज :- माहे मोहर्रम की सातवीं तारीख पर प्रयागराज में वर्ष 1836 से चली आ रही परंपरा के तहत ऐतिहासिक गश्ती दुलदुल जुलूस बड़े अदब और एहतराम के साथ निकाला गया। शाहगंज के पानदरीबा स्थित इमामबाड़ा मिर्जा सफदर अली बेग से भोर में शुरू हुआ यह जुलूस पूरे दिन और रात शहर के विभिन्न इलाकों में भ्रमण करने के बाद अगले दिन सुबह अपने कदीमी इमामबाड़े पर पहुंचकर सम्पन्न हुआ।
    करीब 191 वर्षों से जारी इस परंपरा में दुलदुल का जुलूस शाहगंज, पत्थर गली, बरनतला, मिन्हाजपुर, नखास कोहना, अहमदगंज, काजीगंज, बख्शी बाजार, रौशनबाग, सियाहमुर्ग, रानीमंडी, लोकनाथ, गुड़ मंडी, बहादुरगंज, घंटाघर और सब्जी मंडी समेत दर्जनों मोहल्लों से होकर गुजरा। रास्ते भर लोगों ने जुलूस का स्वागत किया और दुलदुल की जियारत कर अपनी अकीदत पेश की।
    दूध-जलेबी और भीगी चने की दाल से किया गया इस्तकबाल

    जुलूस में शामिल दुलदुल को सफेद चादर, लाल छींटों और गुलाब-चमेली के फूलों से सजाया गया था। घर-घर पहुंचने पर अकीदतमंदों ने दूध-जलेबी और भीगी हुई चने की दाल खिलाकर अपनी श्रद्धा व्यक्त की। महिलाओं, बुजुर्गों और बच्चों ने बड़ी संख्या में दुलदुल की जियारत की तथा मन्नतें मांगीं।

    इस दौरान एकता और गंगा-जमुनी तहजीब की खूबसूरत मिसाल भी देखने को मिली। मुस्लिम समुदाय के साथ-साथ हिंदू परिवारों ने भी दुलदुल का स्वागत किया। कई स्थानों पर महिलाएं सिर पर पल्लू रखकर और पुरुष नंगे पांव खड़े होकर दुलदुल की जियारत करते नजर आए। लोगों ने अपने बच्चों को दुलदुल के नीचे से निकालकर सलामती और खुशहाली की दुआएं मांगीं।

    दो दर्जन अलम के साथ निकला मातमी जुलूस

    सातवीं मोहर्रम के अवसर पर दो दर्जन से अधिक अलमों के साए में नौहाख्वानी और मातम भी किया गया। मुरादाबाद से आए अकीदतमंदों ने अपने पूर्वजों की परंपरा निभाते हुए अलमों के साथ मातमी जुलूस में शिरकत की। डॉ. मुस्तफा के इमामबाड़े से लेकर दायरा शाह अजमल तक नौहाख्वानी करते हुए जुलूस निकाला गया, जहां बड़ी संख्या में लोगों ने हिस्सा लिया।

    जुलूस के संचालन और व्यवस्था में मिर्जा चंगेज, सुहैल, शमशाद, जहांगीर, सलीम, मुन्ना, माहे आलम, मुर्तुजा अली बेग, मुज्तबा अली बेग, रिजवान, सादिक समेत कई लोगों ने अहम भूमिका निभाई।

    सातवीं मोहर्रम पर निकला यह ऐतिहासिक गश्ती दुलदुल जुलूस न सिर्फ धार्मिक आस्था का प्रतीक बना, बल्कि प्रयागराज की साझा संस्कृति, भाईचारे और सदियों पुरानी गंगा-जमुनी तहजीब का भी जीवंत उदाहरण पेश करता रहा।


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