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    होर्मुज के बाद अब बाब अल-मंडेब पर नजर! अमेरिका से वार्ता रोकने के बाद ईरान की नई रणनीति से बढ़ी वैश्विक चिंता

    ईरान और अमेरिका के बीच बातचीत बंद होने के बाद मध्य-पूर्व में तनाव लगातार बढ़ता नजर आ रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया जा रहा है कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के बाद अब बाब अल-मंडेब जलडमरूमध्य को लेकर भी स्थिति गंभीर हो सकती है। यदि ऐसा होता है तो इसका असर केवल क्षेत्रीय नहीं बल्कि पूरी दुनिया के व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ सकता है।

    क्या है बाब अल-मंडेब स्ट्रेट?

    बाब अल-मंडेब एक बेहद महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है, जो एशिया, मध्य-पूर्व और यूरोप को जोड़ता है। यह यमन और अफ्रीका के हॉर्न क्षेत्र के बीच स्थित है, जबकि इसके आसपास जिबूती और इरिट्रिया जैसे देश मौजूद हैं। इसी रास्ते के जरिए लाल सागर, अदन की खाड़ी और अरब सागर एक-दूसरे से जुड़े हैं। आगे चलकर यह मार्ग स्वेज नहर के जरिए यूरोप तक पहुंचता है।

    ईरान का कितना प्रभाव?

    होर्मुज जलडमरूमध्य की तुलना में ईरान का बाब अल-मंडेब पर सीधा नियंत्रण नहीं है, लेकिन यमन के हूती विद्रोहियों के जरिए वह यहां अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश करता रहा है। पहले भी क्षेत्रीय संघर्षों के दौरान हूती समूह कई व्यापारिक जहाजों को निशाना बना चुका है।

    दुनिया के व्यापार की अहम कड़ी

    लाल सागर और बाब अल-मंडेब कॉरिडोर से हर साल वैश्विक व्यापार का लगभग 10 से 12 प्रतिशत हिस्सा गुजरता है। इस मार्ग से तेल, एलएनजी, कंटेनर कार्गो और अन्य जरूरी सामान की आवाजाही होती है। यही वजह है कि इसे दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा और व्यापारिक मार्गों में गिना जाता है।

    भारत पर क्या होगा असर?

    भारत की अर्थव्यवस्था समुद्री व्यापार और खाड़ी देशों से आने वाले ऊर्जा संसाधनों पर काफी हद तक निर्भर है। भारत के तेल आयात का बड़ा हिस्सा होर्मुज, बाब अल-मंडेब और स्वेज नहर से जुड़े समुद्री रास्तों से होकर आता है। ऐसे में यदि इस मार्ग में किसी प्रकार की बाधा आती है, तो भारत के यूरोप और उत्तरी अफ्रीका से जुड़े व्यापारिक रूट प्रभावित हो सकते हैं। इसका असर तेल कीमतों, शिपिंग लागत और घरेलू बाजार पर भी दिखाई दे सकता है।


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