लाल किले पर गूंजी ‘वंदे मातरम’ की धुन, 150 साल की ऐतिहासिक यात्रा फिर हुई जीवंत
नई दिल्ली :- देश के 80वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लाल किले का ऐतिहासिक परिसर उस समय देशभक्ति के रंग में और सराबोर हो उठा, जब समारोह के दौरान सेना के बैंड ने ‘वंदे मातरम’ की धुन प्रस्तुत की। राष्ट्रीय गीत की धुन और सामूहिक गायन ने स्वतंत्रता आंदोलन की उस विरासत को फिर जीवंत कर दिया, जिसने कभी अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ देशवासियों में राष्ट्रीय चेतना की नई ऊर्जा पैदा की थी।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच लाल किले की प्राचीर से राष्ट्रीय ध्वज फहराया और देशवासियों को संबोधित किया। ध्वजारोहण के बाद राष्ट्रगान हुआ और राष्ट्रीय ध्वज को सलामी दी गई। समारोह स्थल की सजावट में भी ‘वंदे मातरम’ को विशेष स्थान दिया गया। लाल किले की प्राचीर पर फूलों की सजावट के बीच तिरंगा लगाया गया था और उसके दोनों ओर हिंदी में ‘वंदे मातरम’ लिखा नजर आया।ध्वजारोहण के बाद भारतीय वायु सेना के दो Mi-17 हेलीकॉप्टरों ने समारोह स्थल पर पुष्पवर्षा की। एक हेलीकॉप्टर तिरंगा लेकर उड़ता दिखाई दिया, जबकि दूसरे पर ‘वंदे मातरम’ अंकित ध्वज नजर आया। इस दृश्य ने समारोह की देशभक्ति की भावना को और प्रभावशाली बना दिया।
1875 में रचा गया था ‘वंदे मातरम’
‘वंदे मातरम’ का इतिहास लगभग डेढ़ सदी पुराना है। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने इसकी रचना 7 नवंबर 1875 को की थी। शुरुआती दौर में यह साहित्यिक पत्रिका ‘बंगदर्शन’ में प्रकाशित हुआ। बाद में वर्ष 1882 में इसे उनके प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंद मठ’ में शामिल किया गया।
यानी ‘वंदे मातरम’ की रचना 1882 में नहीं, बल्कि उससे पहले 1875 में हो चुकी थी। 1882 में इसका साहित्यिक और व्यापक प्रसार ‘आनंद मठ’ के माध्यम से हुआ।मातृभूमि को नमन का भाव
‘वंदे मातरम’ का सामान्य अर्थ है—मां, मैं तुम्हें नमन करता हूं। इसमें मां का भाव मातृभूमि के प्रति सम्मान और समर्पण से जुड़ा है। यही भाव आगे चलकर इसे स्वतंत्रता आंदोलन का बेहद प्रभावशाली गीत और राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक बनाने में महत्वपूर्ण साबित हुआ।
आजादी की लड़ाई के दौरान ‘वंदे मातरम’ की गूंज सभाओं, जुलूसों और आंदोलनों में सुनाई देती थी। यह गीत धीरे-धीरे अंग्रेजी शासन के विरोध, स्वदेशी भावना और देशभक्ति के मजबूत प्रतीक के रूप में स्थापित हो गया।1905 में आंदोलन की बुलंद आवाज बना
वर्ष 1905 ‘वंदे मातरम’ के इतिहास में बेहद अहम पड़ाव माना जाता है। बंगाल विभाजन के विरोध में देशभर में आंदोलन तेज हुआ और स्वदेशी तथा विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का अभियान जोर पकड़ने लगा।
7 अगस्त 1905 को कलकत्ता के टाउन हॉल की ओर निकाले गए विशाल जुलूस में बड़ी संख्या में छात्रों और लोगों ने ‘वंदे मातरम’ के नारे लगाए। इसी दौर में यह गीत अंग्रेजी शासन के खिलाफ जनआंदोलन की आवाज बनता चला गया।इसके बाद ‘वंदे मातरम’ सिर्फ एक गीत नहीं रहा, बल्कि राष्ट्रीय एकता, स्वदेशी आंदोलन और स्वतंत्रता की भावना का प्रतीक बन गया।
वाराणसी के कांग्रेस अधिवेशन में भी गूंजा
वर्ष 1905 में कांग्रेस के वाराणसी अधिवेशन में भी ‘वंदे मातरम’ की गूंज सुनाई दी। इसके बाद राष्ट्रीय आंदोलनों, सभाओं और कांग्रेस के आयोजनों में इसका इस्तेमाल बढ़ता गया। देश के अलग-अलग हिस्सों में स्वतंत्रता सेनानियों और आम लोगों के बीच यह राष्ट्रीय चेतना जगाने का महत्वपूर्ण माध्यम बना।
1950 में मिला राष्ट्रीय गीत का दर्जा*ल
देश की आजादी के बाद भी ‘वंदे मातरम’ का महत्व कायम रहा। वर्ष 1950 में संविधान सभा ने इसे भारत के राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकार किया। इस तरह एक साहित्यिक रचना से शुरू हुई इसकी यात्रा स्वतंत्रता आंदोलन की आवाज बनने से लेकर स्वतंत्र भारत के राष्ट्रीय गीत तक पहुंची।
150 वर्ष पूरे होने पर सालभर कार्यक्रम
‘वंदे मातरम’ की रचना के 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर केंद्र सरकार ने सालभर चलने वाले कार्यक्रमों की शुरुआत की है। इन आयोजनों का उद्देश्य राष्ट्रीय गीत के इतिहास, स्वतंत्रता संग्राम में इसकी भूमिका और देश की राष्ट्रीय चेतना पर इसके प्रभाव को याद करना है।
80वें स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से गूंजी ‘वंदे मातरम’ की धुन ने इस ऐतिहासिक यात्रा को एक बार फिर देश के सामने ला दिया। करीब डेढ़ सदी पहले लिखे गए शब्द आज भी राष्ट्रभक्ति और मातृभूमि के प्रति सम्मान की भावना को मजबूती से अभिव्यक्त करते हैं।






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