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    यूपी में 2027 चुनाव से पहले युवाओं की नई गोलबंदी, शिक्षा और रोजगार के मुद्दे पर सरकार की बढ़ सकती है चुनौती


    लखनऊ :- उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले युवाओं की सक्रियता ने सियासी हलकों में हलचल बढ़ा दी है। शिक्षा, रोजगार और प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं जैसे मुद्दों को लेकर देश के अलग-अलग हिस्सों में छात्र और युवा आवाज उठा रहे हैं। इसी क्रम में उत्तर प्रदेश में भी युवाओं ने एक नए संगठन के गठन का ऐलान किया है। संगठन ने शिक्षा और रोजगार से जुड़े सवालों को लेकर प्रदेशभर में अभियान चलाने की बात कही है।

    बताया गया है कि 10 अगस्त को उत्तर प्रदेश में 'जस्टिस मोर्चा' के गठन की घोषणा की गई। संगठन के मुताबिक 12 अगस्त से प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में उसकी गतिविधियां शुरू होंगी। यदि मांगों पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई तो आगामी 2 अक्टूबर से आंदोलन शुरू करने की तैयारी भी की जा रही है।

    देश के कई हिस्सों में छात्र आंदोलन से बढ़ी सक्रियता

    युवाओं की यह सक्रियता केवल उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं है। देश के अलग-अलग राज्यों में छात्र शिक्षा व्यवस्था, पेपर लीक और रोजगार से जुड़े मुद्दों को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं। दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्र आंदोलन और झारखंड की राजधानी रांची में चल रहे विरोध-प्रदर्शनों ने भी व्यापक चर्चा बटोरी है।

    पेपर लीक के विरोध में आंदोलन कर रहे छात्रों के विधानसभा परिसर तक पहुंचने की खबरों के बीच हैदराबाद में भी छात्र एक दीक्षांत समारोह में मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत को आमंत्रित किए जाने के विरोध में लामबंद हुए।

    इन घटनाओं के बीच उत्तर प्रदेश में युवाओं का संगठित होकर शिक्षा और रोजगार के सवालों को उठाना आगामी विधानसभा चुनाव के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    युवा वोट बैंक बन रहा चुनावी राजनीति का बड़ा आधार

    उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव का माहौल धीरे-धीरे तैयार हो रहा है। चुनाव अगले साल मार्च के आसपास प्रस्तावित हैं, हालांकि समय से पहले चुनाव कराए जाने की संभावनाओं की भी राजनीतिक चर्चा होती रही है।

    ऐसे समय में यदि युवाओं का कोई संगठन रोजगार, भर्ती परीक्षाओं, शिक्षा और पेपर लीक जैसे सीधे तौर पर बड़ी संख्या में मतदाताओं को प्रभावित करने वाले मुद्दों पर आंदोलन करता है, तो इसका असर राजनीतिक दलों पर पड़ना स्वाभाविक है। इसका सबसे ज्यादा दबाव सत्तारूढ़ दल पर पड़ सकता है।

    युवा वर्ग अब केवल आंदोलनकारी ताकत नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण वोट बैंक के रूप में भी उभर रहा है। हाल के चुनावों में भी युवा मतदाताओं की बड़ी संख्या ने राजनीतिक दलों का ध्यान अपनी ओर खींचा है।

    देश के कई राज्यों में युवाओं की बड़ी हिस्सेदारी

    असम में 18 से 39 वर्ष आयु वर्ग के मतदाताओं की संख्या 1.28 करोड़ से अधिक बताई गई थी। पश्चिम बंगाल में 18 से 29 वर्ष आयु वर्ग के करीब 1.37 करोड़ मतदाता थे। इनमें 5.23 लाख ऐसे मतदाता थे, जो पहली बार मतदाता सूची का हिस्सा बने।

    तमिलनाडु में युवा मतदाताओं की संख्या करीब 1.04 करोड़ यानी लगभग 19 प्रतिशत रही। केरल में भी 96 हजार से अधिक युवाओं के पहली बार मतदाता सूची में शामिल होने की बात सामने आई थी। वहीं पुडुचेरी में करीब 2.1 लाख युवा मतदाताओं ने मतदान किया।

    उत्तर प्रदेश में भी युवा मतदाताओं की संख्या चुनावी गणित में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। 2022 के विधानसभा चुनाव के दौरान 18-19 वर्ष आयु वर्ग के मतदाताओं की संख्या करीब 20 लाख थी। ताजा एसआईआर के बाद यह संख्या 17,63,360 बताई गई है।

    हर पांचवां यूपी वोटर युवा

    2024 के लोकसभा चुनाव से पहले उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक देश में 18 से 29 वर्ष आयु वर्ग के मतदाताओं की संख्या 21.59 करोड़ से अधिक थी, जो कुल मतदाताओं का करीब 23 प्रतिशत हिस्सा था।

    चुनाव आयोग के 2024 एटलस के आंकड़ों के अनुसार उत्तर प्रदेश में 18 से 29 वर्ष आयु वर्ग के मतदाताओं की हिस्सेदारी 21.19 प्रतिशत थी। यानी राज्य में लगभग हर पांचवां मतदाता युवा वर्ग से आता है।

    देश के विभिन्न राज्यों में 18-29 वर्ष आयु वर्ग के मतदाताओं की हिस्सेदारी इस प्रकार रही—

    राज्य/केंद्र शासित प्रदेश युवा मतदाता प्रतिशत
    दादरा एवं नगर हवेली तथा दमन एवं दीव 38.80%
    मेघालय 36.31%
    अरुणाचल प्रदेश 34.13%
    मिजोरम 31.19%
    असम 28.95%
    झारखंड 28.38%
    जम्मू-कश्मीर 27.89%
    राजस्थान 27.78%
    मध्य प्रदेश 27.16%
    सिक्किम 26.16%
    छत्तीसगढ़ 26.13%
    पश्चिम बंगाल 24.07%
    बिहार 22.80%
    हरियाणा 22.20%
    उत्तराखंड 22.18%
    पंजाब 21.44%
    उत्तर प्रदेश 21.19%
    कर्नाटक 21.09%
    महाराष्ट्र 19.82%
    तमिलनाडु 19.43%
    दिल्ली 15.89%
    केरल 15.04%
    भारत 22.70%

    2014 में भी युवाओं ने निभाई थी अहम भूमिका

    राजनीतिक विश्लेषण में युवाओं की भूमिका को 2014 के लोकसभा चुनाव से जोड़कर भी देखा जाता है। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) के आंकड़ों के मुताबिक 2014 के चुनाव में 18 से 25 वर्ष आयु वर्ग के करीब 70 प्रतिशत युवाओं ने मतदान किया था।

    युवा मतदाताओं की बढ़ती संख्या आने वाले चुनावों में राजनीतिक दलों की रणनीति को प्रभावित कर सकती है। 2029 के लोकसभा चुनाव तक 18 से 32 वर्ष आयु वर्ग का युवा वर्ग एक बेहद बड़ा चुनावी समूह बन सकता है। यही वजह है कि राजनीतिक दलों के लिए युवाओं की नाराजगी को नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा।

    योगी सरकार के सामने क्यों बढ़ सकती है चुनौती?

    उत्तर प्रदेश में 2027 का विधानसभा चुनाव मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के लिए भी महत्वपूर्ण होगा। यदि भाजपा उन्हें तीसरी बार मुख्यमंत्री पद के चेहरे के तौर पर मैदान में उतारती है, तो सरकार को सत्ता विरोधी भावनाओं का सामना करना पड़ सकता है।

    ऐसे में यदि बेरोजगारी, सरकारी भर्तियों, प्रतियोगी परीक्षाओं और पेपर लीक जैसे मुद्दों पर युवाओं का असंतोष संगठित रूप लेता है, तो विपक्ष को सरकार को घेरने का एक प्रभावी मुद्दा मिल सकता है।

    इसके अलावा 2027 के चुनाव में 2014 या 2019 जैसी परिस्थितियों में बनी राष्ट्रीय स्तर की राजनीतिक लहर के समान प्रभाव की गारंटी नहीं मानी जा सकती। ऐसे में उत्तर प्रदेश में युवाओं का समर्थन हासिल करना भाजपा समेत सभी राजनीतिक दलों के लिए अहम होगा।

    फिलहाल 'जस्टिस मोर्चा' की घोषणा के बाद यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि संगठन प्रदेश में अपनी गतिविधियों को किस स्तर तक विस्तार देता है और शिक्षा तथा रोजगार के मुद्दे को कितना बड़ा राजनीतिक सवाल बना पाता है।


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