29 को दिखा चांद तो 27 मई को मनेगी ईद-ए-कुर्बां
हज़रत इब्राहीम की सुन्नत अदा करने को दी जाती है तीन दिन कुर्बानी
वाराणसी :- 29 वीं के चांद का दीदार अगर हो गया तो ईद-ए-कुर्बां 27 मई को मनाया जाएगा। कुर्बानी देने के कारण इस्लाम धर्म में बकरीद को प्रमुख त्योहारों में से एक माना जाता है। इसे ईद उल-अज़हा नाम से भी जानते हैं। ये उत्सव पैगंबर इब्राहिम द्वारा किए जाने वाले सर्वोच्च बलिदान को याद करके मनाया जाता है। अल्लाह के प्रति समर्पण के रूप में इस दिन कुर्बानी दी जाती है। इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार, बकरीद का त्योहार हर वर्ष जुलहिज्जा (12वां महीना) की दसवीं तारीख को मनाया जाता है। इस दिन जानवर की कुर्बानी देने के साथ इसे तीन भागों में बांटा जाता है। आइए जानते हैं इस साल बकरीद कब पड़ रही है। इसके साथ ही जानें इस दिन कुर्बानी देने के पीछे क्या है धार्मिक कारण…
कब है बकरीद 2026?
दिल्ली की ऐतिहासिक फतेहपुरी मस्जिद के मौजूदा शाही इमाम मुफ्ती मुकर्रम अहमद एक प्रसिद्ध इस्लामिक विद्वान, लेखक और खतीब हैं। उनके अनुसार, इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार, इस्लामिक कैलेंडर के मुताबिक 12वें महीने जु अल-हज्जा की 10वीं तारीख को ईद उल-अज़हा का पर्व मनाया जाता है। इस साल ज़ु अल-हज्जा महीना 30 दिन का है। इसलिए इस साल बकरीद 27 या फिर 28 मई को मनाई जा सकती है। हालांकि अंतिम पुष्टि स्थानीय चांद देखने पर निर्भर करती है।
बकरीद क्यों दी जाती है कुर्बानी?
बता दें कि बकरीद से कुछ दिन पहले मुस्लिम समुदाय के लोग बकरा लेकर आते हैं। इसका अपने बच्चे की तरह ख्याल रखते हैं। समय-समय पर खाने पीने का पूरा ख्याल रखा जाता है। ऐसा करने से उसके प्रति प्रेम जाग जाता है। जिस तरह हज़रत इब्राहीम का अपने बेटे के प्रति प्रेम था। फिर बाद में दुआ पढ़कर अल्लाह का नाम लेकर बकरीद के ज़बह कर देते हैं।
इस्लामिक मान्यताओं के मुताबिक, एक बार अल्लाह ने पैगंबर हज़रत इब्राहीम की परीक्षा लेने की सोची। ऐसे में उन्होंने हज़रत इब्राहीम को ख्वाब (सपने) के जरिए अपनी एक प्यारी चीज अल्लाह की राह कुर्बान करने के लिए कहा। जब हज़रत इब्राहीम उठे, तो वह इस सोच में पड़ गए कि आखिर उनके लिए सबसे प्रिय चीज क्या है? बता दें कि हज़रत इब्राहीम अपने इकलौते बेटे इस्माइल को सबसे अधिक प्रेम करते थे। वहीं एक चीज है जिसे वह सबसे अधिक प्रेम करते थे। लेकिन अल्लाह की मांग को पूरा करने के लिए वह अपने बेटे को कुर्बान करने के लिए तैयार हो गए।
जब वह अपने बेटे को लेकर कुर्बान करने के लिए जा रहे थे, तो उन्हें एक शैतान मिला। जिसने हज़रत इब्राहीम से कहा कि आप अपने बेटे को क्यों कुर्बान कर रहे हैं इसके बदले किसी जानवर की कुर्बानी दे दें। हज़रत इब्राहीम साहब को शैतान की ये बात अच्छी लगी। लेकिन उन्होंने सोचा कि ये तो अल्लाह के साथ धोखा करना है और उनके द्वारा दिए गए हुक्म की नाफरमानी होगी। इसलिए वह बिना कुछ सोचे अपने बेटे को लेकर आगे बढ़ गए। उस जगह वह पहुंच गए जिस जगह पर बेटे की कुर्बानी देनी थी। लेकिन पिता के मोह ने उन्हें ऐसा करने से रोका। ऐसे में उन्होंने अपने आंखों में पट्टी बांध ली, जिससे पुत्र मोह अल्लाह के राह में बाधा न बने। इसके बाद उन्होंने कुर्बानी दे दी। लेकिन ऐसे ही उन्होंने अपनी आंखों से पट्टी हटाई, तो वह देखकर हैरान रह गए है कि उनका बेटा इस्माइल सही सलामत है और उनकी जगह एक डुम्बा ( बकरी की एक प्रजाति) कुर्बान हो गया था। इसके बाद से ही कुर्बानी के तौर पर बकरा को कुर्बान किया जाता है।
तीन भागों में बांटा जाता है कुर्बान किया हुआ बकरा बता दें कि बकरीद के दिन जिस बकरे की कुर्बानी दी जाती है। उसे तीन भागों में बांटा जाता है। इसमें से पहला भाग स्वयं के लिए, दूसरा हिस्सा अपने किसी दोस्त या फिर करीबी के लिए तीसरा हिस्सा किसी गरीब या फिर जरूरतमंद को दिया जाता है।

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