उर्दू अदब के अज़ीम शायर बशीर बद्र का इंतकाल, वाराणसी के अदबी हलकों में शोक की लहर
वाराणसी :- उर्दू शायरी की दुनिया के मशहूर शायर बशीर बद्र साहब अब हमारे बीच नहीं रहे। ईदुल अज़हा के मुकद्दस दिन 91 वर्ष की उम्र में भोपाल में उनका इंतकाल हो गया। उनके निधन की खबर से वाराणसी के अदबी, शायरी और साहित्य प्रेमियों में गहरा दुख है। बनारस की गंगा-जमुनी तहज़ीब से जुड़े लोगों ने उन्हें खिराज-ए-अक़ीदत पेश किया।
बशीर बद्र साहब ने अपनी ग़ज़लों के जरिए मोहब्बत, तन्हाई, रिश्तों और इंसानी जज़्बात को बेहद सादगी और खूबसूरती से बयान किया। उनकी शायरी बनारस की महफ़िलों, मुशायरों और साहित्यिक बैठकों में अक्सर पढ़ी और सराही जाती रही।
काशी की सांस्कृतिक फिज़ा में उनकी मशहूर पंक्तियां आज भी लोगों की जुबान पर हैं। उनके इंतकाल को उर्दू अदब की दुनिया का एक बड़ा नुकसान माना जा रहा है।
कुछ अमर शेर जो हर दिल की आवाज़ हैं
- कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी
- यूँ कोई बेवफ़ा नहीं होता
- उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
- न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए
- लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
- तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में
- उन्हें पद्मश्री से भी सम्मानित किया गया था। उनकी शायरी आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक विरासत रहेगी।
- श्रद्धांजलि स्वरूप कुछ पंक्तियाँ
- अल्फ़ाज़ के उस फ़नकार को सलाम
- जिसने दर्द को भी ख़ूबसूरती से लिखा
- महफ़िलें ख़ामोश होंगी अब शायद
- पर हर दिल में बशीर बद्र हमेशा रहेंगे ज़िंदा।।
- (सुमंगला सुमन)

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