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    काशी में ब्रिक्स सम्मेलन की शुरुआत: विदेशी मेहमानों का पारंपरिक स्वागत, दुनिया के सामने दिखेगी बनारस की सांस्कृतिक पहचान

    वाराणसी :- ब्रिक्स देशों के संस्कृति कार्य समूह की दूसरी बैठक में भाग लेने के लिए विभिन्न सदस्य देशों के प्रतिनिधियों का काशी आगमन शुरू हो गया है। दक्षिण अफ्रीका, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), ब्राजील, चीन समेत अन्य देशों के प्रतिनिधियों का लाल बहादुर शास्त्री अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट पर पारंपरिक भारतीय शैली में भव्य स्वागत किया गया। स्वागत समारोह के जरिए विदेशी मेहमानों को काशी की सांस्कृतिक विरासत और भारतीय परंपराओं की झलक दिखाई गई।
    एयरपोर्ट परिसर में लोक कलाकारों ने धोबिया, करमा और नटवरी जैसे पारंपरिक लोकनृत्यों की मनमोहक प्रस्तुतियां दीं। वहीं छात्र-छात्राओं ने विभिन्न देशों के राष्ट्रीय ध्वज लहराकर मेहमानों का अभिनंदन किया। पूरे माहौल को भारतीय संस्कृति के रंगों से सजाया गया, जिससे विदेशी प्रतिनिधि भी काफी प्रभावित नजर आए।
    एयरपोर्ट प्रशासन के अनुसार प्रतिनिधियों के स्वागत के लिए विशेष इंतजाम किए गए हैं। एयर इंडिया की उड़ान एआई-2623 से दक्षिण अफ्रीका के प्रतिनिधि क्लीन नोआ, जोसेफ मोकगेथी और मसाना चिकेका के साथ यूएई की फातिमा अलसुबैदी और शथा अलमुल्ला वाराणसी पहुंचे। इसके अलावा इंडिगो की फ्लाइट 6ई-5025 से ब्राजील के लुकास गोडॉय विलेला तथा चीन के झांग हॉलिन और तेंगयुआन हे भी काशी पहुंचे।

    इस बैठक में भारत सहित ब्राजील, रूस, चीन, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और इंडोनेशिया के 30 से अधिक प्रतिनिधि हिस्सा ले रहे हैं। बैठक के दौरान सदस्य देशों के बीच सांस्कृतिक सहयोग, विरासत संरक्षण और कला के आदान-प्रदान से जुड़े विषयों पर चर्चा होने की संभावना है।

    ब्रिक्स सम्मेलन में दिखेगी बनारस के हुनर और जीआई उत्पादों की झलक

    दो दिवसीय सम्मेलन के दौरान काशी के पारंपरिक शिल्प और स्थानीय उत्पाद भी वैश्विक मंच पर अपनी पहचान बनाएंगे। उद्योग विभाग की ओर से जीआई (भौगोलिक संकेतक) टैग वाले उत्पादों के नौ विशेष स्टॉल लगाए जा रहे हैं। इनमें बनारसी सिल्क, ज्वेलरी, कालीन, लकड़ी के खिलौने और अन्य पारंपरिक उत्पादों को प्रदर्शित किया जाएगा।

    सिर्फ उत्पादों की प्रदर्शनी ही नहीं, बल्कि शिल्पकार अपनी कला का जीवंत प्रदर्शन भी करेंगे, ताकि विदेशी प्रतिनिधि काशी की सदियों पुरानी कारीगरी और परंपराओं को करीब से समझ सकें। सम्मेलन के जरिए काशी को एक बार फिर अपनी सांस्कृतिक विरासत और शिल्प कौशल को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शित करने का अवसर मिला है।


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