चांद के दीदार संग ग़म का महीना मोहर्रम शुरू, पहला जुलूस आज
- दो माह 8 दिन ग़म का अय्याम, नहीं मनेगी खुशियां
- कर्बला के शहीदों की याद में निकलेगा जुलूस होगी मजलिसें
- शिया ख़्वातीन ने तोड़ी चूड़ियां, हटाया साजो श्रृंगार, पहना काला लिवास
सुन्नी मस्जिदों में एक से दस मुहर्रम तक शहादतनामा व तकरीर होती है तो शिया मुसलमान इमाम हुसैन की शहादत का जिक्र करते हैं। उनका गम मनाने के लिए मजलिसें करते हैं। मजलिसों में इमाम हुसैन की शहादत बयान की जाती है। मजलिस में तकरीर (स्पीच) करने के लिए ईरान से भी इंडिया में आलिम (धर्मगुरू) आते हैं और जिस इंसानियत के पैगाम के लिए इमाम हुसैन ने शहादत दी थी उसके बारे में लोगों को विस्तार से बताया जाता है। उधर लोगों ने एक दूसरे को इस्लामिक नये साल की मुबारकबाद दी। सोशल मीडिया, खासकर फेसबुक और व्हाट्स एप पर इस्लामी हिजरी नये साल की मुबारकबाद लोग अपने अजीजों से शेयर कर रहे थे। हालांकि यह महीना अदब और एहतराम का भी है इसलिए नया साल बेहद सादगी के साथ मनाया जाता है।
शहर भर में हुई इस्तेकबालिया मजलिसे
आज मोहर्रम के चांद होते ही हर तरफ फिजा गमगीन हो गई। या हुसैन या हुसैन...की सदाएं फिजा में गूंजने लगी। हर तरफ इस्तकबाले अज़ा की मजलिसे हुईं व इमामबाड़ों में शमां रोशन किया गया और शरबत पर कर्बला के शहीदों की नजर हुई। शहर भर की 28 अंजुमनों ने नोहाख्वानी और मातम का आगाज़ किया। इस दौरान मजलिस में बताया गया कि यह वह महीना है कि जिसमें इमाम हुसैन ने अपने 71 साथियों के साथ इंसानियत को बचाने के लिए कुर्बानी पेश की।
इंसानियत के लिए मिसाल है शहादत-ए-हुसैन
इस्लाम की तारीख में मुहर्रम बड़े ही अकीदत, एहतेराम के साथ मनाया जाता है। इंसानियत के लिए शहादत-ए-हुसैन एक मिसाल है। मुहर्रम का चांद दिखाई देने के बाद तनवीर फातेमा ने कहा कि मुहर्रम पर 2 महीना 8 दिन ग़म मनाया जाता है। यही नहीं पूरे दो माह 8 दिन शिया समुदाय के लोग किसी भी खुशी में शरीक नहीं होते। चांद दिखाई देने के साथ ही इमाम बारगाह, अजाखानो, घरों में मजलिसों का सिलसिला शुरू हो गया।
फातेमा ने कहा कि इमाम हुसैन ने जो इन्सानियत की राह दिखाई है ,वही हक पर चलने की नेक राह है। इमाम हुसैन ने जुल्म के खिलाफ आवाज़ उठाने का पैगाम दिया, हुसैन ने जालिम का साथ नहीं दिया। इसीलिए आपको अपने 72 साथियों के साथ इतनी बड़ी कुर्बानी देनी पड़ी, लेकिन यही कुर्बानी दीन को बचा ले गई, और उसी कुर्बानी की वजह से इंसानियत दुनिया में अभी भी जिंदा है। इमाम हुसैन का बलिदान सत्य, न्याय, धार्मिकता महान प्रेरणा है।मोहर्रम के वाराणसी में प्रमुख जुलूस
हज़रत अली समिति के सदस्य सलमान हैदर ने पत्रकारों को जुलूस की डिटेल बताई। उन्होंने कहा कि बनारस शहर में कई जगह जुलूसों के रास्तों की परेशानियां हैं और प्रशासन से अपील की जाती है कि वह रास्तों की दुश्वारियां को दूर कराएं और सुरक्षा के इंतजाम किए जाएं। उन्होंने बताया कि
- 17 जून (पहली मोहर्रम): सुबह 7 बजे से मजलिसें शुरू होंगी। दोपहर 3 बजे लाट सरैया इमामबाड़े में अलम और दुलदुल का जुलूस निकलेगा।
- 18 जून (दूसरी मोहर्रम): शिवपुर में रात 8 बजे जुलूस उठेगा। दोपहर 2 बजे उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ के घर पर कदीमी मजलिस होगी।
- 19 जून (तीसरी मोहर्रम): सायं 5 बजे औसानगंज नवाब की ड्योढ़ी से और शिवाला से अलम का जुलूस निकलेगा।
- 20 जून (चौथी मोहर्रम): चौहट्टा लाल खाँ इमामबाड़ा से रात 8 बजे अलम व दुलदुल का जुलूस निकलेगा।
- 21 जून (पांचवीं मोहर्रम): गोविंदपुरा से अलम का जुलूस उठेगा, जिसमें उस्ताद बिस्मिल्लाह खां के परिजन शहनाई पर मातमी धुन बजाएंगे।
- 22 जून (छठवीं मोहर्रम): विश्व प्रसिद्ध 40 घंटे का दुलदुल जुलूस कच्ची सराय (दालमंडी) से शाम 5 बजे उठेगा, जो शहर के अलग-अलग रास्तों से होते हुए 24 जून (8 मोहर्रम) की सुबह वापस आएगा।
- 24 जून (आठवीं मोहर्रम): चहमामा इमामबाड़े से रात 8:30 बजे अलम व तुर्बत का जुलूस निकलेगा।
- 25 जून (नवीं मोहर्रम): इमाम चौकों पर ताजिये रखे जाएंगे। रात में शिवाला से प्रसिद्ध दूल्हा का जुलूस निकलेगा और भोर में फातमान में अंगारों पर मातम होगा।
- 26 जून (दसवीं मोहर्रम - आशुरा): सुबह से शाम तक जंजीर और कमा का मातम करते हुए 26 अंजुमनों के जुलूस निकलेंगे जो लाट सरैया और फातमान जाकर खत्म होंगे। शाम को 'शामे गरीबां' की मजलिस होगी।
- 27 जून (ग्यारहवीं मोहर्रम): दिन में 11 बजे 'चुप का डंका' यानी लुटे हुए काफिले का जुलूस निकलेगा।
- 28 जून (बारहवीं मोहर्रम - तीजा): दोपहर बाद आलम और अखाड़े का जुलूस निकलेगा।
(मोहम्मद रिजवान)


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