बारिश कम, आंधी-तूफान ज्यादा: आखिर इस बार मौसम का मिजाज इतना बदला-बदला क्यों है?
मौसम विशेषज्ञों के मुताबिक इसके पीछे कई कारण एक साथ काम कर रहे हैं। इनमें अल-नीनो, पश्चिमी विक्षोभ, बढ़ता वैश्विक तापमान और वायुमंडल की बढ़ती अस्थिरता प्रमुख हैं।
अल-नीनो से कमजोर पड़ सकती हैं मॉनसून की हवाएं
साल 2026 में अल-नीनो की स्थिति तेजी से विकसित होती दिख रही है। यह स्थिति तब बनती है जब प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से का तापमान सामान्य से अधिक हो जाता है। इसका असर दुनिया के कई हिस्सों के मौसम पर पड़ता है और भारत में मॉनसून पर भी इसका प्रभाव देखने को मिलता है।
मौसम विभाग के अनुमान के अनुसार इस बार मॉनसून सामान्य स्तर से कम रह सकता है। अल-नीनो के दौरान कुल बारिश घट सकती है, लेकिन वातावरण में गर्मी और नमी के मिश्रण से स्थानीय स्तर पर तेज तूफान और असामान्य मौसम घटनाएं बढ़ जाती हैं।
पूर्व-मॉनसून में बढ़ रही है हलचल
मई और जून का समय पूर्व-मॉनसून अवधि माना जाता है। इस दौरान उत्तर भारत में गर्मी अपने चरम पर रहती है। जमीन बहुत अधिक गर्म हो जाती है और ऊपर से अपेक्षाकृत ठंडी हवाएं आने पर वायुमंडल में तेजी से बदलाव होता है।
इससे हवा अचानक ऊपर उठती है और गरज-चमक, तेज हवाओं तथा धूल भरी आंधियों की स्थिति बन जाती है। कई इलाकों में हवाओं की रफ्तार 30 से 100 किलोमीटर प्रति घंटे तक पहुंच रही है।
पश्चिमी विक्षोभ भी निभा रहे बड़ी भूमिका
इन दिनों पश्चिमी विक्षोभ भी सक्रिय हैं। ये मौसम प्रणालियां भूमध्यसागरीय क्षेत्र से उत्तर भारत की ओर बढ़ती हैं और अपने साथ नमी लेकर आती हैं। इनकी वजह से वातावरण में अस्थिरता बढ़ती है और मौसम अचानक बदल जाता है।
यही कारण है कि कई जगहों पर तेज हवाओं के साथ थोड़ी देर बारिश होती है और कुछ ही घंटों बाद फिर मौसम साफ या शुष्क हो जाता है।
जलवायु परिवर्तन ने बढ़ाई चिंता
विशेषज्ञ मानते हैं कि जलवायु परिवर्तन इस पूरे पैटर्न को और गंभीर बना रहा है। बढ़ते वैशिक तापमान के कारण वातावरण अधिक नमी धारण कर रहा है, लेकिन बारिश के दिनों की संख्या कम होती जा रही है।
अब सामान्य और लगातार बारिश की जगह कम समय में अत्यधिक बारिश की घटनाएं बढ़ रही हैं। इससे एक तरफ बाढ़ का खतरा पैदा होता है, जबकि दूसरी ओर लंबे समय तक सूखे जैसी स्थिति भी बनी रहती है।
गर्मी बढ़ने से हवाओं में अधिक ऊर्जा पैदा होती है, जिससे आंधी और तूफान पहले की तुलना में अधिक शक्तिशाली हो रहे हैं।
कृषि और स्वास्थ्य पर पड़ रहा असर
मौसम के इस बदलते स्वरूप का असर किसानों, आम लोगों और शहरों की व्यवस्था पर भी पड़ रहा है। खरीफ फसलों की बुवाई प्रभावित हो रही है क्योंकि बारिश का समय और मात्रा अनिश्चित होती जा रही है। तेज हवाएं फसलों को नुकसान पहुंचा रही हैं।
धूल और गर्मी से सांस संबंधी समस्याएं बढ़ रही हैं, जबकि शहरों में बिजली व्यवस्था और यातायात पर भी असर पड़ रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि आने वाले समय में अल-नीनो और मजबूत हुआ तो मॉनसून के दूसरे चरण में बारिश और कम हो सकती है। हालांकि भारतीय महासागर की परिस्थितियां कुछ राहत दे सकती हैं।
मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि यह सिर्फ एक साल का बदलाव नहीं, बल्कि भविष्य में मौसम के नए पैटर्न की झलक भी हो सकती है। इसलिए जल संरक्षण, बेहतर मौसम पूर्वानुमान, सूखा-रोधी फसलें और पर्यावरण संरक्षण जैसे उपायों पर तेजी से काम करने की जरूरत होगी।

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