काशी में गूंजा 'जय जगन्नाथ' का जयघोष, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा संग रथ पर विराजे प्रभु; तीन दिवसीय रथयात्रा महोत्सव शुरू
वाराणसी में गुरुवार से भगवान जगन्नाथ की ऐतिहासिक तीन दिवसीय रथयात्रा का भव्य शुभारंभ हो गया। प्रभु जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ सजे-धजे रथ पर विराजमान होकर भक्तों को दर्शन देने निकले। सुबह ब्रह्ममुहूर्त में भगवान का पीतांबरी श्रृंगार किया गया, जिसके बाद मंगला आरती संपन्न हुई और मंदिर के कपाट श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए गए। तड़के से ही दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी और मंदिर परिसर से बाहर तक करीब दो किलोमीटर लंबी कतार देखने को मिली।भक्ति में डूबा काशी, हजारों श्रद्धालु बने रथयात्रा के साक्षीकरीब पांच किलोमीटर लंबी रथयात्रा में शामिल होने के लिए हजारों श्रद्धालु पहुंचे। पूरे मार्ग पर 'जय जगन्नाथ' और 'हर-हर महादेव' के जयघोष से वातावरण भक्तिमय हो उठा। भगवान को छप्पन भोग अर्पित किया गया, जबकि श्रद्धालुओं को प्रसाद स्वरूप तुलसी दल और पारंपरिक नानखटाई वितरित की गई। भक्तों ने भगवान जगन्नाथ से परिवार की सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य और मंगल की कामना की।
इस अवसर पर जगन्नाथ मंदिर ट्रस्ट से जुड़े पूर्व एमएलसी बृजेश सिंह भी अपने परिवार के साथ मौजूद रहे और रथयात्रा में सहभागिता की।
16 से 18 जुलाई तक चलेगा रथयात्रा महोत्सव
जगन्नाथ मंदिर ट्रस्ट के अनुसार, रथयात्रा महोत्सव 16, 17 और 18 जुलाई तक आयोजित किया जाएगा। ट्रस्ट की ओर से श्रद्धालुओं की सुविधा, सुरक्षा और व्यवस्थाओं के व्यापक इंतजाम किए गए हैं ताकि दर्शन-पूजन के दौरान किसी को असुविधा का सामना न करना पड़े। ट्रस्ट ने काशीवासियों और बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं से अधिक से अधिक संख्या में मेले में शामिल होकर भगवान जगन्नाथ का आशीर्वाद लेने की अपील की है।
करीब 250 वर्ष पुरानी है काशी की रथयात्रा की परंपरा
काशी की जगन्नाथ रथयात्रा का इतिहास लगभग ढाई सौ वर्ष पुराना माना जाता है। मान्यता है कि वर्ष 1765 के बाद पुरी के श्रीजगन्नाथ मंदिर के मुख्य पुजारी का तत्कालीन शासक से विवाद हो गया था। इसके बाद वे भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की प्रतिमाएं लेकर काशी आए और अस्सी क्षेत्र में रहने लगे।
कहा जाता है कि उस समय पुरी से नियमित रूप से भगवान का महाप्रसाद काशी भेजा जाता था। एक बार भीषण चक्रवात के कारण प्रसाद नहीं पहुंच सका। तभी भगवान जगन्नाथ ने मुख्य पुजारी को स्वप्न में दर्शन देकर काशी में ही मंदिर स्थापित करने और यहीं नियमित पूजा-भोग की व्यवस्था करने का आदेश दिया। इसके बाद अस्सी क्षेत्र में भगवान जगन्नाथ का मंदिर स्थापित हुआ और तभी से काशी की ऐतिहासिक रथयात्रा की परंपरा आज तक निरंतर चली आ रही है।

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