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    लक्ष्मीकुंड में उमड़ा आस्था का सैलाब, महिलाओं ने 16 दिवसीय सोरहिया व्रत का लिया संकल्प

    • राधिका तिवारी

    वाराणसी :- काशी में मां महालक्ष्मी की आराधना के लिए प्रसिद्ध सोरहिया मेले की शुरुआत शुक्रवार को भाद्रपद शुक्ल अष्टमी से हो गई। लक्ष्मीकुंड स्थित महालक्ष्मी मंदिर में आधी रात के बाद से ही श्रद्धालुओं के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया। धन-धान्य, सुख-समृद्धि, ऐश्वर्य, शांति और संतान की कामना लेकर बड़ी संख्या में महिलाओं ने मां लक्ष्मी के दर्शन कर विधि-विधान से पूजन किया।

    भोर में मंदिर के गर्भगृह में मां सरस्वती, महालक्ष्मी और महाकाली के मुखौटे सजाए गए। भोग अर्पित करने के बाद विधिवत पूजा-अर्चना और आरती हुई। इसके बाद मंदिर के कपाट श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए गए। मंदिर परिसर में दिनभर श्रीसूक्त और स्वर्णाकर्षण मंत्रों के पाठ से वातावरण भक्तिमय बना रहा। सुबह से देर रात तक दर्शन-पूजन का क्रम जारी रहेगा।

    पूजन के दौरान महिलाओं ने मां महालक्ष्मी के चरणों में 16 गांठ वाला धागा अर्पित कर 16 दिवसीय व्रत-अनुष्ठान का संकल्प लिया। मंदिर के पुजारी गणेश उपाध्याय के अनुसार, व्रत के दौरान 16 आचमन, देवी की 16 परिक्रमा तथा 16 चावल के दाने, दूर्वा, पल्लव और कमल पुष्प अर्पित करने की परंपरा है। महिलाएं धागा धारण करने के बाद घरों में भी निर्धारित विधि से मां महालक्ष्मी की पूजा करती हैं।

    धार्मिक मान्यता के अनुसार सोरहिया व्रत से परिवार में सुख-शांति, आरोग्य और समृद्धि बनी रहती है। कथा के मुताबिक महाराजा जिउत ने संतान प्राप्ति की कामना से मां लक्ष्मी की आराधना की थी। देवी ने प्रसन्न होकर उन्हें 16 दिनों तक कठिन व्रत करने का निर्देश दिया था। इसी मान्यता के आधार पर महिलाएं सोलह दिनों तक यह व्रत और अनुष्ठान करती हैं।

    मिट्टी की लक्ष्मी प्रतिमाओं की बढ़ी मांग

    सोरहिया मेले में पूजा सामग्री के साथ मिट्टी से बनी मां लक्ष्मी की प्रतिमाओं की भी खूब बिक्री हुई। श्रद्धालुओं ने प्रतिमाओं को घर ले जाने के लिए बांस की डलिया भी खरीदी। महिलाएं इन प्रतिमाओं को घर में स्थापित कर 16 दिनों तक पूजा-अर्चना करेंगी। व्रत का समापन 16वें दिन जीवित्पुत्रिका पर्व के अवसर पर होने वाले निर्जला व्रत के साथ होगा।


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